हनुमान चालीसा की रचना कैसे हुई? (मुग़ल जेल से जुड़ी सच्ची कहानी)

आज जो चालीसा हम इतने आराम से पढ़ लेते हैं, उसकी रचना बहुत ही कठिन परिस्थितियों में हुई थी। अकबर की कैद से लेकर बंदरों के हमले तक का वह ऐतिहासिक और चमत्कारी किस्सा अत्यंत रोमांचक है।

History of Hanuman Chalisa by Goswami Tulsidas True Story
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हम में से शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा जिसने कभी न कभी हनुमान चालीसा का पाठ न किया हो। जब भी मन में कोई डर बैठ जाता है या कोई मुसीबत सामने आती है, तो हम तुरंत चालीसा गुनगुनाने लगते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस चालीसा को हम इतनी आसानी से पढ़ लेते हैं, उसकी रचना आखिर कैसे और किन हालात में हुई थी?

इसके पीछे की कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है! अगर आप रोज़ श्री हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इसे किसी शांत मंदिर में बैठकर नहीं, बल्कि मुग़ल बादशाह अकबर की जेल (कालकोठरी) में लिखा गया था। चलिए, आज बिल्कुल आसान और आम बोलचाल वाली भाषा में जानते हैं हनुमान चालीसा की रचना की वो रोमांचक और सच्ची कहानी।

तुलसीदास जी और बादशाह अकबर की पहली मुलाकात

यह बात 16वीं शताब्दी की है, जब संत गोस्वामी तुलसीदास जी अपनी राम-भक्ति और रामचरितमानस की रचना के लिए पूरे देश में मशहूर हो रहे थे। कहा जाता है कि तुलसीदास जी की भक्ति में इतनी ताकत थी कि एक बार उनके प्रार्थना करने पर एक मरा हुआ इंसान भी ज़िंदा हो गया था।

जब इस चमत्कार की खबर मुग़ल बादशाह अकबर तक पहुंची, तो उसने तुलसीदास जी को अपने दरबार में बुलाया। अकबर देखना चाहता था कि तुलसीदास जी में सचमुच कोई दैवीय शक्ति है या यह सब सिर्फ एक छलावा है।

जब अकबर ने मांगी ‘राम जी को देखने की शर्त’

जब तुलसीदास जी अकबर के दरबार में पहुंचे, तो अकबर ने घमंड में आकर उनसे कहा— “अगर तुम इतने बड़े संत हो, तो मुझे अभी इसी वक़्त अपने भगवान श्री राम के दर्शन कराओ!”

तुलसीदास जी ने बहुत ही विनम्रता से जवाब दिया— “प्रभु श्री राम केवल सच्चे प्रेम और भक्ति से मिलते हैं। वे किसी के कहने पर जादू-टोना या तमाशा दिखाने के लिए प्रकट नहीं होते।” यह सुनकर अकबर का अहंकार टूट गया और वह गुस्से से आगबबूला हो गया। उसने तुरंत अपने सिपाहियों को हुक्म दिया कि तुलसीदास जी को लोहे की भारी जंजीरों में बांधकर कालकोठरी में डाल दिया जाए।

जेल की कालकोठरी में रची गई हनुमान चालीसा

अकबर के आदेश पर तुलसीदास जी को अंधेरी जेल में बंद कर दिया गया। लेकिन तुलसीदास जी ज़रा भी नहीं घबराए। वे जानते थे कि संकट की इस घड़ी में उनके प्रभु राम के सबसे प्रिय भक्त हनुमान जी ही उनकी मदद कर सकते हैं। रामायण की कथाओं और राम भक्ति में भी यही बताया गया है कि जहां राम का नाम होता है, वहां हनुमान जी तुरंत रक्षा के लिए पहुंच जाते हैं।

तुलसीदास जी ने जेल के अंदर ही ध्यान लगाया और संकटमोचन हनुमान जी की स्तुति में पंक्तियां लिखना शुरू कर दिया। उन्होंने हनुमान जी की वीरता, बुद्धि, कृपा और रूप का वर्णन करते हुए 40 पंक्तियां (चौपाइयां) रचीं। यही 40 पंक्तियां आगे चलकर ‘हनुमान चालीसा’ के नाम से जानी गईं।

40वें दिन हुआ वो भयानक चमत्कार (वानर सेना का हमला)

तुलसीदास जी जेल में बैठकर लगातार 40 दिनों तक उन चौपाइयों का पाठ करते रहे। और फिर 40वें दिन एक ऐसा चमत्कार हुआ जिसने पूरे मुग़ल साम्राज्य को हिलाकर रख दिया!

अचानक हज़ारों-लाखों विशाल लाल मुंह वाले बंदरों (वानर सेना) ने अकबर के महल और जेल पर हमला बोल दिया। बंदरों ने महल की दीवारों को तोड़ना शुरू कर दिया, सिपाहियों के हथियार छीन लिए और चारों तरफ तबाही मचा दी। अकबर के पहरेदार डर के मारे इधर-उधर भागने लगे। मंत्र जाप और साधना की शक्ति का यह ऐसा नज़ारा था जिसे देखकर अकबर के होश उड़ गए।

अकबर ने मांगी माफी और मिली रिहाई

जब महल में हाहाकार मच गया, तो अकबर के काज़ी और मंत्रियों ने उससे कहा— “जहांपनाह! आपने एक सच्चे राम-भक्त को जेल में बंद करके बहुत बड़ी गलती की है। यह हमला उन्हीं के हनुमान जी का प्रकोप है।”

अकबर को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह तुरंत दौड़ता हुआ कालकोठरी में गया, लोहे के ताले खुलवाए और तुलसीदास जी के पैरों में गिरकर माफी मांगने लगा। तुलसीदास जी ने जैसे ही अकबर को माफ किया और जेल से बाहर कदम रखा, सारे बंदर अपने आप शांत होकर वहां से गायब हो गए। इसके बाद अकबर ने तुलसीदास जी को पूरे आदर के साथ विदा किया और हुक्म दिया कि उनके राज्य में किसी भी राम-भक्त को कभी परेशान न किया जाए। हनुमान चालीसा के ज्योतिषीय फायदे भी यही बताते हैं कि जो इंसान रोज़ इसका पाठ करता है, उसकी बड़ी से बड़ी विपत्ति टल जाती है।

चलते-चलते

चलते-चलते बस इतना ही कहूंगा कि हनुमान चालीसा कोई मामूली किताब नहीं है, बल्कि यह संकट के समय जेल की अंधेरी कालकोठरी में रची गई एक महा-औषधि है। तुलसीदास जी ने अपने कष्ट को मिटाने के लिए जिन 40 चौपाइयों को रचा था, वे आज करोड़ों लोगों के जीवन से डर और दुखों को मिटा रही हैं। अगली बार जब भी आप हनुमान चालीसा का पाठ करें, तो तुलसीदास जी के उस अटूट विश्वास को अपने मन में जरूर याद कीजिएगा। जय श्री राम, जय बजरंगबली!


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

हनुमान चालीसा की रचना किसने और कब की थी?

हनुमान चालीसा की रचना 16वीं शताब्दी में महान संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी। उन्होंने इसे मुग़ल बादशाह अकबर की जेल में रहते हुए लिखा था।

हनुमान चालीसा में कुल कितनी चौपाइयां होती हैं?

हनुमान चालीसा में मुख्य रूप से 40 चौपाइयां होती हैं, इसीलिए इसे ‘चालीसा’ कहा जाता है। इसके अलावा इसमें शुरुआत में 2 दोहे और अंत में 1 दोहा शामिल है।

अकबर ने तुलसीदास जी को जेल में क्यों बंद किया था?

अकबर ने घमंड में आकर तुलसीदास जी से अपने सामने भगवान श्री राम को प्रकट करने की शर्त रखी थी। जब तुलसीदास जी ने कहा कि भगवान कोई तमाशा दिखाने की चीज नहीं हैं, तो गुस्सा होकर अकबर ने उन्हें जेल में डाल दिया था।

क्या सच में हनुमान चालीसा पढ़ने से वानर सेना ने हमला किया था?

जी हां, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तुलसीदास जी के लगातार 40 दिनों तक पाठ करने के बाद 40वें दिन लाखों बंदरों ने अकबर के महल और जेल पर हमला कर दिया था, जिसके बाद अकबर ने हार मानकर उन्हें रिहा किया था।

हनुमान चालीसा का पाठ लगातार 40 दिन करने का क्या महत्व है?

जिस तरह तुलसीदास जी ने 40 दिन पाठ करके संकट से मुक्ति पाई थी, ठीक उसी तरह माना जाता है कि लगातार 40 दिनों तक हनुमान चालीसा का अनुष्ठान करने से इंसान के जीवन की बड़ी से बड़ी परेशानी दूर हो जाती है।